लंबे आंदोलन की कोख से जन्मा उत्तराखंड आखिर किस ओर जा रहा है? राज्य गठन से पहले पर्यावरण बचाने के लिए चिपको और शराब के खिलाफ टिंचरी जैसे बड़े आंदोलन कर चुके इस राज्य में राज्य गठन के बाद भी विभिन्न विषयों को लेकर आंदोलन होते रहे हैं। कभी लोग सड़कों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं तो कभी स्कूलों में शिक्षक की मांग व विद्यालयों के उच्चीकरण या कभी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर आंदोलन होते रहे। समय-समय पर विभिन्न संगठन गैरसैंण राजधानी, बांधों के विरोध और हिमालय को बचाने के लिए भी आंदोलन की अलग जगाने की कोशिश करते रहे हैं।

वर्तमान में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के एक परीक्षा का पेपर लीक होने के मुद्दे पर फिर ऐसा ही एक आंदोलन चल रहा है। इस आंदोलन में भी बहुत लोग और चेहरे आंदोलन को और हवा देने की कोशिश में लगे हैं। ऐसा हर आंदोलन में होता है। ऐसा लग रहा है कि कुछ चेहरे तो इस आंदोलन को नेपाल के उन युवाओं की बेकाबू भीड़ में तब्दील कर देना चाहते हैं जिन्होंने बिना किसी योजना के अपने ही देश को बहुत पीछे धकेल दिया। आंदोलन को गहराई से देखा जाए तो उसमें लग रहा है कि आंदोलन पेपर लीक और परीक्षा में पारदर्शिता जैसे अपने विषय को ही भूलता जा रहा है।

आंदोलन को पूरी तरह व्यक्तिगत रूप से कुछ नेताओं और बड़ी पॉलिटिकल पार्टियों के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है जबकि किसी विषय विशेष के लिए शुरू किए गए आंदोलन का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए कि उस समस्या का समाधान हो जाए। आंदोलनकारियों को इस पर जरूर गौर करना चाहिए कि उनकी समस्या को लेकर सरकार और जिम्मेदार लोग कितनी गंभीरता से रिस्पांस कर रहे हैं। अगर उनका रिस्पांस सामने आ रहा है तो उस पर भी भरोसा करने की भी जरूरत है।

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आमतौर पर हर आंदोलन में कुछ ऐसे चेहरे शामिल हो जाते हैं जो अपनी नेतागिरी को चमकाने के लिए आंदोलन के विषय को सुलझने ही नहीं देना चाहते।
मैं एक छोटे से आंदोलन का उदाहरण देना चाहता हूं। वर्ष 2003 में मेरे घेस गांव की सड़क का मामला फिर गर्म हो गया था। आबादी कम होने की वजह से इस सड़क को पीएमजीएसवाई के फेज दो में स्वीकृति नहीं मिल पाने से लोग गुस्से में आ गए थे। इसके बाद देवाल में धरना देने का निर्णय लिया गया। धरने को सफल बनाने के लिए घेस और हिमनी के प्रत्येक परिवार से देवाल में चल रहे धरने शामिल होना अनिवार्य किया गया। लगातार दूसरे तीसरे दिन 25 -30 किलोमीटर दूर देवाल जाकर धरने में शामिल होने से ग्रामीणों को बहुत अधिक दिक्कतें शुरू हो गई। कुछ साथियों ने मुझे भी अप्रोच किया की भाई ऊपर से आप लोग बात करो नहीं तो यहां गांव के लोगों को बहुत दिक्कत हो गई है।

हर दूसरे तीसरे दिन देवाल जाना पड़ रहा है, जिससे लोगों को पशुपालन और खेती के काम में बहुत कठिनाइयां हो गई है। मैंने तत्कालीन जिलाधिकारी को फोन करके इस आंदोलन के बारे में बताया और उनसे आग्रह किया वे स्वयं जाकर आंदोलनकारियों को सड़क के लिए आश्वस्त करायें और आंदोलन खत्म करें। कलेक्टर साहब ने मुझसे कहा कि वह प्रशासन के लोगों को वहां भेज चुके हैं लेकिन लोग मानने को राजी नहीं है। अगर आप इस संबंध में कुछ पहल कर सकते हैं तो आप भी आइए और मैं स्वयं भी आता हूं। करीब दो ढाई हफ्ते बाद में भी देहरादून से चला और कुछ व्यस्तता के चलते डीएम साहब ने सीडीओ को वार्ता के लिए भेजा। जब हम मौके पर पहुंचे तो देखा कि आंदोलन को आगे चलाने के लिए गांव के लोगों से ज्यादा इंटरेस्टेड कुछ और ही लोग थे।

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ऐसे लोग जब मंच पर माइक संभाल रहे थे तो वह यह कहकर गांव के लोगों को जोश दिला रहे थे कि हम यहां से सड़क ही लेकर जाएंगे, बिना सड़क लिए हम यहां से उठने वाले नहीं हैं। वे गांव के लोगों को ऐसे कह रहे थे कि मानों सड़क किसी दुकान में रखी आलमारी या सोफा हो और वहां से खरीद कर सरकार उनको दे दे। और गांव के लोग उसे उठाकर अपने गांव चल दें। वहां ब्लॉक मुख्यालय पर रहने वाले ऐसे तमाम चेहरे थे जो यह चाहते थे कि यह आंदोलन महीनों तक चला रहे और वे यहां पब्लिक के बीच में आकर माइक पर अपना गला साफ करते रहें। देर शाम जब गांव के लोगों समझाया कि भाई आपकी बात सरकार तक पहुंच चुकी है और किसी भी आंदोलन का यही एक उद्देश्य भी होता है तब जाकर के लोग सहमत हुए और आंदोलन उसी रात को खत्म करने का निर्णय लिया।

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जैसे ही घेस हिमनी का क्षेत्र आबादी के हिसाब से पीएमजीएसवाई के मानक में आया, सड़क स्वीकृत हो गई और आज उस क्षेत्र के सभी लोगों को पता है कि घेस के लिए पीएमजीएसवाई से 27 किलोमीटर लंबी सड़क स्वीकृत हुई, जो 2009 में पूरी तरह धरातल पर उतर कर घेस हिमनी क्षेत्र की लाइफ लाइन बन गई। यह अलग बात है कि इस आंदोलन के बाद हम लोग लगातार सरकार पर सड़क के लिए दबाव बनाए रखने में लगे रहे।
यहां इस प्रसंग का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूं कि किसी भी विषय को लेकर आंदोलन करने वाले आंदोलनकारियों को यह बात समझनी पड़ेगी कहीं आपकी ताकत की आड़ में कोई अपनी रोटी तो नहीं सेंक रहा है।

आंदोलन को समर्थन देने वालों में बहुत सारे चेहरे ऐसे भी होंगे, जिनके अपने निजी स्वार्थ होंगे और वह सिस्टम को प्रभावित करके अपनी खुन्नस निकलने की चाहत रखता हो। आंदोलन होते रहे हैं और आगे भी होते ही रहेंगे। इसलिए आंदोलन में बैठे लोगों को यह बात समझना जरूरी है कि हमारा आंदोलन अपने उद्देश्य से कतई ना भटके। हमें इस बात का ध्यान जरूर रखना होगा कि आंदोलन के रूप में जुटी हमारी ताकत को कोई दिगभ्रमित भी ना कर पाए। सरकार ने नकल विरोधी कानून लाकर एक अच्छी पहल की है, लेकिन इस पहल का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब इसका पालन भी सख्ती के साथ होगा।

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